चम्बा हिमाचल प्रदेश : Amit Kumar – हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में एक बेहद ही शानदार और प्रसिद्ध और पारंपरिक chamba minjar मेला होता है । और 2025 का ये मेला जुलाई महीने से शुरू हो चुका है । हालांकि ये मेला बहुत ही ऐतिहासिक और प्रसिद्ध है । लेकिन इस मेले में इस बार इसकी चर्चा किसी और topic के लिए अधिक है । और वो मामला है यहां के चम्बा के प्रसिद्ध और होनहार कलाकारों की अनदेखी किया जाना । हैरानी की बात ये है कि यहां चंबा की लोकल गायिका जिनका नाम पूनम भारद्वाज है । और साथ ही प्रसिद्ध गायक इशांत भारद्वाज इन दोनों ही कलाकारों को मेले में मंच नहीं दिया गया है । जबकि इन दोनों कलाकारों को लोग मेले में सुनना चाहते हैं । और ये कलाकार इतने प्रसिद्ध हैं कि साथ लगते राज्यों जैसे जम्मू , उत्तराखंड और हिमाचल के बाकी जिलों में इन्हें लोग बाकी कलाकारों से पहले मंच देने के लिए उत्सुक रहते हैं । और इनके अपने जिले में अपने मेले में इन्हें अनदेखा कर दिया गया है । अब इस बात को हजम करना लोगों के लिए आसान नहीं है । और ये मुद्दा social media पर trend कर रहा है ।
लोकल कलाकारों को न बुलाना बना विवाद का कारण
पूनम और इशांत भारद्वाज न केवल चंबा, बल्कि पूरे हिमाचल में पहाड़ी संगीत का जाना-पहचाना नाम हैं। फिर भी, इस वर्ष मिंजर मेले में इन दोनों को प्रदर्शन का अवसर नहीं दिया गया।
स्थानीय युवाओं और संस्कृति प्रेमियों का मानना है कि इस तरह की उपेक्षा चंबा की सांस्कृतिक पहचान को ठेस पहुंचाती है। और कई लोगों का तो ये भी कहना है कि किसी की व्यक्तिगत नापसंद के कारण इन्हें अनदेखा किया जा रहा है । जबकि पूरे जिले की जनता इन्हें इतना प्यार करती है और देखती है कि मेला समिति इन्हें अनदेखा कर दे ये सामान्य बात नहीं है ।
सोशल मीडिया पर विरोध: ट्रेंड हुए हैशटैग
जनता ने सोशल मीडिया पर जमकर गुस्सा जाहिर किया। ट्विटर और इंस्टाग्राम पर ट्रेंड कर रहे हैं:
#MinjarMelaControversy#SupportLocalArtists#JusticeForPoonamIshant
एक यूजर का सवाल — । “हमारी अपनी धरती के कलाकारों को मंच नहीं मिलेगा तो किसे मिलेगा?”
इतिहास और परंपरा से जुड़ा है मिंजर मेला
Chamba Minjar मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, चंबा की ऐतिहासिक जीत और सांस्कृतिक गर्व का प्रतीक है।
इसकी शुरुआत लगभग 935 ईस्वी में हुई थी, जब चंबा के राजा ने त्रिगर्त (आज का कांगड़ा) पर विजय पाई थी।
राजा की वापसी पर लोगों ने धान और मक्के की मालाओं से उनका स्वागत किया, जो समृद्धि और शुभता का प्रतीक मानी जाती है।
श्रावण महीने के दूसरे रविवार से शुरू होने वाला यह मेला एक सप्ताह तक चलता है। इसकी शुरुआत होती है ‘मिंजर’ नाम की एक रेशमी लटकन के वितरण से, जिसे लोग गर्व से अपने वस्त्रों पर सजाते हैं। यह लटकन धान और मक्के के नए अंकुर का प्रतीक मानी जाती है। लोग इसे एक दूसरे को तोहफ़े के रूप में देते हैं । और चंबा के लोगों में इसकी काफी सांस्कृतिक मान्यता है ।
चौगान मैदान से लेकर नलहोरा तक रंगीन जुलूस
मिंजर मेले का सबसे बड़ा आकर्षण उसका रंगीन जुलूस होता है, जिसमें पारंपरिक वाद्य यंत्र, लोक नर्तक दल, और पुलिस बैंड भाग लेते हैं।
यह जुलूस ऐतिहासिक चंडी महल से शुरू होकर नलहोरा तक जाता है। मुख्य अतिथि पहले राजा की तरह नारियल, मिंजर, मौसमी फल और एक रुपया नदी में अर्पित करते हैं।
इसके बाद आम लोग भी अपने-अपने मिंजर पानी में प्रवाहित करते हैं। इसी दिन पारंपरिक लोकगीतों — जैसे कुंजरी-मल्हार — की प्रस्तुति होती है और इत्र व पान आमंत्रित अतिथियों को दिए जाते हैं।
तो फिर पूनम और इशांत कहां हैं?
अब सवाल उठ रहा है कि जब Chamba Minjar मेला इतना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से गहरा जुड़ा हुआ है, तो फिर इस वर्ष चंबा के सबसे चर्चित कलाकारों को क्यों नज़रअंदाज़ किया गया?
अब तक ईशांत भारद्वाज ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं दी है, लेकिन पूनम भारद्वाज ने इस मुद्दे पर खुलकर अपना पक्ष रखा है और उन्होंने social media Live के माध्यम से इस मुद्दे पर बात की है । और उनके प्रशंसकों और स्थानीय नागरिकों ने खुलकर मेला प्रबंधन की आलोचना की है। पूनम भारद्वाज ने कहा कि उन्हें खुद इस बात की हैरानी है कि आखिर इस नजरअंदाजगी का क्या कारण रहा होगा । उन्होंने आगे कहा कि हालांकि उन्हें इस मंच से मिलने वाली राशि या मौका न दिए जाने पर कोई भी दुख नहीं है । लेकिन ये सब उन्हें उनके अपने लोकल स्थान और जन्म स्थान पर देखने को मिला उसका मलाल उनके दिल में है ।
जनता की मांग: लोकल टैलेंट को मिले सम्मान
स्थानीय लोगों का कहना है कि भविष्य में इस तरह की चूक दोबारा न हो, इसके लिए मेला कमेटी को:
स्थानीय कलाकारों की प्राथमिकता तय करनी चाहिए
चयन प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए
और जनता की भावनाओं का आदर किया जाए
मिंजर मेला में रंग तो है, पर स्वाद अधूरा
Chamba Minjar मेला आज भी चंबा का गर्व है, लेकिन जब अपनी मिट्टी के कलाकार उपेक्षित होते हैं, तो उत्सव भी अधूरा लगता है।
संस्कृति को जिंदा रखने के लिए सिर्फ मंच नहीं, सम्मान और पहचान भी जरूरी है। और जब तक लोकल सांस्कृतिक कलाकारों का समान नहीं होगा । जो हमारी संस्कृति को संजोने में हम भूमिका निभाते है । तब तक किसी मेले को सांस्कृतिक कहना शायद गलत होगा । आप अगर अपने जिले में जो कि एक सांस्कृतिक जिला और स्थान है । वहां पर सांस्कृतिक संध्या का आयोजन कर रहे हो और उस मंच पर आपके लोकल कलाकार न होकर पंजाबी या हिंदी कलाकार ही सिर्फ दिखाई दें तो ये दुखद है ।













