नई दिल्ली, 14 अक्टूबर 2025 | Newstop ब्यूरो : हिन्दू धर्म में काफी मान्यता रखने वाली Ahoi Ashtami Ki Katha का पर्व अहोई अष्टमी साल 2025 में 13 अक्टूबर को मनाया गया । ये एक धार्मिक मान्यता से जुड़ा हुआ व्रत होता है । लेकिन कई लोग इस के पीछे की कहानी और कथा नहीं जानते और ये क्यूँ रखा जाता है आज हम इसके बारे में चर्चा करेंगे और साथ ही इस से जुड़ी सच्ची कहानी जो की Ahoi Ashtami Ki Katha के रूप में जानी जाती है उसे भी पढ़ेंगे । ये व्रत हर साल कार्तिक महीने में कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को रखा जाता है ।
कई जगह पर अहोई अष्टमी को “अहोई आठें” के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह व्रत महीने के आठवें दिन रखा जाता है। इस दिन माताएँ अपनी संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए अहोई माता की पूजा करती हैं। जिसकी वजह से ये कई राज्यों में बड़ी मान्यता के साथ माताओं द्वारा रखा जाता है ।
Ahoi Ashtami Ki Katha अहोई अष्टमी की पौराणिक कथा
इस व्रत से जुड़ी एक बहुत पौराणिक कथा है । जिसे सिर्फ कहानी नहीं माना जाता है मान्यता के अनुसार ये एक सच्ची घटना से जुड़ी हुई कहानी है जिसे Ahoi Ashtami Ki Katha के नाम से जाना जाता है ।
Ahoi Ashtami Ki Katha | अहोई अष्टमी कथा
प्राचीन काल में एक गाँव में एक साहूकार महिला अपने सात बेटों के साथ रहती थी । साल के कार्तिक महीने की अष्टमी को वो महिला जगल में मिट्टी खोद कर लाने गई जिस से वो अपने घर की लिपाई और सजावट करने वाली थी । जब वो महिला मिट्टी खोद रही थी तब खोदते समय गलती से उसके फावड़े के नीचे एक साही का बच्चा जिसे सूइन भी कहा जाता है फावड़ा लगने से उसकी मृत्यु हो गई ।
उस दिन वो मिट्टी तो घर लेकर आई लेकिन उस दिन के बाद से महिला के घर में अनहोनियाँ होना शुरू हो गया । दुखों की बाढ़ सी आ गई और सबसे अधिक दुख उसे उसके सात बेटों की वजह से मिलने लगा जिन्हें आकस्मिक बीमारियाँ और रोग हो जाने लगे । धीरे धीरे उसके बेटे एक एक करके सब मृत्यु को प्राप्त हो गए ।
महिलों दुखों से घिरी हुई थी और उसे उस दिन हुई साही के बच्चे की मृत्यु याद आई जिसके बाद उसने अपनी गलती को मानते हुए उसका पश्चाताप करने का फैसला किया । और पूरे साल भर अहोई माता की पूजा की । अगले साल कार्तिक मास के अष्टमी के दिन अहोई माता उस महिला के सामने प्रकट हुई और कहा में तुम्हारे पश्चाताप से प्रसन हूँ और इस तुम्हारे इस पश्चाताप और व्रत की वजह से तुम्हें तुम्हारे पुत्रों का जीवन वापिस मिलेगा ।
तब से लेकर आज तक Ahoi Ashtami Ki Katha का यह व्रत शुरू हुआ और यह मान्यता बनी कि अहोई माता की पूजा करने से संतान पर आने वाला संकट दूर हो जाता है। जिसकी वजह से कई राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार दिल्ली समेत कई राज्यों मे इस व्रत को रखा जाता है ।
अहोई अष्टमी व्रत और पूजा की विधि
अहोई अष्टमी के दिन महिलाएँ सूर्य निकलने से पहले उठकर संकल्प लेती हैं कि वे पूरे दिनभर व्रत रखेंगी। कुछ महिलाएँ फलाहार करती हैं, जबकि कई माताएँ निर्जला व्रत भी रखती हैं।
शाम के समय अहोई माता की प्रतिमा या दीवार पर मिट्टी से बनाई गई आकृति की पूजा की जाती है। इसमें सुईन (साही) और उसके बच्चों की आकृति बनाकर जल, फल, चावल, रोली और दूर्वा चढ़ाई जाती है।

Ahoi Ashtami 2026 Muhurat और पूजा का समय
अष्टमी तिथि शुरू: 1 नवंबर , दोपहर 2:51 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 2 नवंबर, दोपहर 1:10 बजे
पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 05:53 से 07:08 तक (कुल अवधि – 1 घंटा 15 मिनट)
तारों के दर्शन का समय: 1 नवंबर शाम 06:00 बजे
चंद्रोदय का समय: रात 11:35 बजे (स्थानानुसार थोड़ा बदल सकता है)
क्यों दिया जाता है तारों को अर्घ्य?
Ahoi Ashtami Ki Katha में एक खास परंपरा है इसमें तारों को अर्घ्य देने की एक मान्यता है और यही प्रथा चली या रही है इस दिन पूजा के समय तारों को अर्घ्य दिया जाता है।
कहा जाता है कि जैसे तारे आकाश में सदैव चमकते रहते हैं, वैसे ही माताएँ अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घायु के लिए तारों को जल अर्पित करती हैं जिस से उनकी मनोकामना पूरी होती है ।
माना जाता है कि तारे अहोई माता के प्रतीक हैं, और उन्हें अर्घ्य देने से संतान के जीवन में स्थिरता और प्रकाश आता है। यही कारण है कि कई जगहों पर चाँद निकलने का इंतज़ार किए बिना माताएँ तारा दर्शन के बाद ही व्रत खोलती हैं।
Ahoi Ashtami Ki Katha और Karwa Chauth का संबंध
दिलचस्प बात यह है कि Ahoi Ashtami Karwa Chauth के ठीक चार दिन बाद आती है। जहाँ करवा चौथ व्रत पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है, वहीं Ahoi Ashtami Ki Katha संतान की सुरक्षा और खुशहाली से जुड़ी है।
ये दोनों पर्व एक जैसे ही लगते है और दोनों में ही किसी अपने की सुरक्षा और समृद्धि के लिए व्रत रखा जाता है । लेकिन इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है ।














