बेंगलुरु से पुणे: Kaushik Mukherjee का बड़ा फैसला
टेक वर्ल्ड में जब कोई नाम काम से नहीं, बल्कि फैसले से चर्चा में आ जाए, तो बात जरूर खास होती है। ऐसा ही हुआ है Kaushik Mukherjee Bangalore के साथ। वे बेंगलुरु में स्थित एक कंपनी SUGAR Cosmetics के Co-founder & COO हैं और अब उन्होंने अपने पूरे ऑफिस को अगले छह महीनों में पुणे शिफ्ट करने का एलान कर दिया है।
वजह: Language Nonsense और कर्मचारियों की चिंता
Mukherjee का कहना है कि ये फैसला उन्होंने “language nonsense” के चलते लिया है। असल में, बेंगलुरु में हाल ही में भाषा को लेकर काफी टेंशन चल रही है, जहां लोकल भाषा कन्नड़ को लेकर कुछ लोगों की आक्रामक सोच सामने आ रही है।
उनके अनुसार, उनकी कंपनी में कई ऐसे एम्प्लॉयीज़ हैं जो कन्नड़ नहीं बोलते। वह नहीं चाहते कि ये लोग ऐसी किसी भाषा पॉलिटिक्स के शिकार बनें, जो न तो प्रोफेशनलिज़्म को सपोर्ट करती है और न ही टीम वर्क को।
Kaushik Mukherjee ने बताया कि इस बारे में सबसे पहले उनकी टीम ने बात की थी। कई कर्मचारियों ने बताया कि वे इस माहौल में अनकंफर्टेबल महसूस कर रहे हैं। एक जिम्मेदार लीडर की तरह उन्होंने टीम की बात को समझा और बड़ा कदम उठाने का फैसला लिया।
बेंगलुरु की पहचान बनाम बदलता माहौल
बेंगलुरु को इंडिया का Silicon Valley कहा जाता है। यहां हर कोने से लोग आकर काम करते हैं — चाहे वो दिल्ली हो, मुंबई हो या चेन्नई। ये शहर हमेशा से एक वेलकमिंग और मिक्स कल्चर वाला रहा है।
लेकिन अब ऐसा लगता है कि भाषा को लेकर चल रहे विवादों ने इसकी इमेज पर असर डालना शुरू कर दिया है। Kaushik Mukherjee Bangalore जैसे फाउंडर का अपने ऑफिस को शिफ्ट करना एक अलार्मिंग सिग्नल है — खासकर उन कंपनियों के लिए जो ग्लोबल टैलेंट और इनक्लूसिव वर्क कल्चर को सपोर्ट करती हैं। क्यूंकी भाषा के आधार पर किसी से भेदभाव किया जाए ये न तो किसी तरह से मानवीय व्यवहार लगता है न ही एक विकसित समाज की परिभाषा और न ही एकता का प्रतीक लगती है । इसलिए ये एक एसी घटना है जो आने वाली दिग्गज कंपनियों को सोचने पर जरूर मजबूर कर देगी ।
पुणे क्यों?
पुणे को एक शांत, प्रोफेशनल और न्यूट्रल वर्किंग एनवायरनमेंट के लिए जाना जाता है। यहां भी बड़ी संख्या में IT कंपनियां हैं और वहां का माहौल ज्यादा इनक्लूसिव है।
Mukherjee के अनुसार, उनकी टीम ने खुद सुझाव दिया था कि अगर माहौल ठीक नहीं लग रहा है तो शिफ्ट हो जाना चाहिए। उन्होंने उसी सुझाव को स्वीकार करते हुए, अपने स्टाफ के हित में निर्णय लिया।
क्या ये एक बड़ा ट्रेंड बनने वाला है?
ये सवाल अब सबके मन में है। क्या अब दूसरे स्टार्टअप्स और कंपनियां भी बेंगलुरु से बाहर जाने का सोचेंगी? अगर भाषा और रीजनल पॉलिटिक्स इसी तरह बढ़ती रही, तो इसका सीधा असर टैलेंट मूवमेंट और इन्वेस्टमेंट पर पड़ेगा। जो की बेंगलुरू के लिए अच्छी बात नहीं होगी और न ही राज्य के लिए ये फायदेमंद होगा । हालांकि ये विवाद काफी लंबे समय से चल रहे हैं लेकिन सरकार इसका कोई समाधान नहीं कर पाई है जिसका मुख्य कारण माना जाता है वहाँ की लोकल पॉलिटिक्स जिसकी वजह से सरकार या तो कुछ कर नहीं पाती या फिर कारना नहीं चाहती ।
Kaushik Mukherjee के इस फैसले ने एक बड़ा डिस्कशन खोल दिया है — क्या वर्कप्लेस पर भाषा थोपना सही है? और क्या किसी खास भाषा को बोलना अनिवार्य करना एक तरह का भेदभाव है?
Kaushik Mukherjee कौन हैं?
Kaushik Mukherjee एक इनोवेटिव और प्रोग्रेसिव सोच वाले टेक फाउंडर हैं। उन्होंने न केवल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम किया है, बल्कि अपनी टीम की भलाई को भी हमेशा प्राथमिकता दी है।
उनकी यह सोच कि “Employees first” ही असली ग्रोथ स्ट्रैटेजी है, आज के कॉर्पोरेट वर्ल्ड में एक इंस्पिरेशन बन सकती है। क्यूंकी जिस तरह से उन्होंने अपने कर्मचारियों की परेशानी को समझ और उनकी सालह ली उसके बाद इतना बड़ा फैसला लेना वो भी करचरियों के कहने से ये कोई मामूली बात नहीं है । और हर एक मालिक के बस की बात भी नहीं है । इसलिए वो आज इस खास विषय पर चर्चा में हैं ।
अगर आप भी ऐसे बिज़नेस मूव्स, स्टार्टअप ट्रेंड्स और प्रोफेशनल कल्चर से जुड़ी खबरों में रुचि रखते हैं, तो हमारी साइट की लेटेस्ट न्यूज़ और बिजनेस अपडेट सेक्शन ज़रूर देखें।
ऐसी ही और खबरों के लिए पढ़ते रहिए newstop.in पर।














